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दुनिया का सबसे महान “सहिष्णु” सहनशील एक भारतीय

Posted On 9 Jan, 2016 Others, social issues में

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सहिष्णुता या सहनशीलता व असहिष्णुता असहनशीलता,
सहिष्णुता कब असहिष्णुता हो जाती है
और कोई व्यक्ति व समाज कहां तक कब तक सहिष्णुता को ढो सकता है
और अंतत: परिणाम क्या होगा
इसी पर
‘कार्ल हॉपर ‘ ने “The Open Society and Its Enemies”(खुला समाज और इसके शत्रु) में उन्होंने सहिष्णु समाज और सहिष्णुता या सहनशीलता का समर्थन करने वालों को आगाह करते हुए कहते है की ” The end of the high-tolerance, this should be the end of tolerance अर्थात अत्याधिक सहिष्णुता या सहनशीलता का अंत, सहिष्णुता या सहनशीलता के ही अंत से होना चाहिए.
अर्थात यदि अत्याधिक सहिष्णुता उनके साथ भी रक्खेंगे, जो सहिष्णु नही है या वे लोग जिनकी भावनाए तुरंत आहात होती है, और सहनशील समाज किसी की भावनाओ के प्रति बहुत ज्यादा सहनशील है तो सहनशील लोगो के साथ उनके समाज का भी अंत निश्चित है.
यदि वे अपने समाज के असहनशील तत्वों से, आप अपने सहनशील समाज की रक्षा के लिये आगे नही आते हैं,
तब आपका और आपके समुदाय का अंत निश्चित है.
मतलब यह की एक पक्षीय सहनशीलता या सहिष्णुता अकर्मण्य व निरीह बना देती है.

और सहिष्णुता या सहनशीलता के चरम या पराकाष्ठा का सबसे उत्तम उदाहरण भारतीय सनातन शास्त्रो के सबसे प्रमुख व पवित्र ग्रंथ श्रीमदभग्वद मे श्री कृष्ण अर्जुन संवाद मे देखते है अर्जुन के रूप मे सबसे महान “सहिष्णु” व्यक्ति उल्लेखित है इतना महान सहिष्णु व्यक्ति संभवत: कोई आज तक हुआ ही नहीं और अंततः सबसे सहनशील व्यक्ति अत्यंत क्रूर बन जाता है और एक महा विनाश कर डालता है .

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥१-४५॥

तब
कूरु क्षेत्र में सब परिचितों को ही चारो ओर देख कर अत्यंत व्यथित व सहिष्णु हो अर्जुन
योगराज श्री कृष्ण से बोले
ओह हे श्रेष्ठ
हम मानव हत्या का जघन्यतम महापाप अपराध को करने के लिये आतुर हो यहाँ युद्ध भूमि में आ खडे हैं।
वह भी मात्र तुच्छ राज्य और सुख के लोभ में अपने ही स्वजनों परिचितों को मारने के लिये व्याकुल हैं।
हे सुदर्शन धारी यह कतई धर्म नहीं है
भले ही मेरे समक्ष मेरे परिचित जानकर लोग पापी, अधर्मी व अधम हो।
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यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥१-४६॥
हे प्रभू ये सभी मुझे से परिचित अथवा रिश्तेदार है मुझसे इन लोगों का विरोध करना मेरे द्वारा संभव नहीं हो पा रहा है, भले ही मेरे शस्त्र उठाये बिना भी ये धृतराष्ट्र पुत्र हाथों में शस्त्र धारण किए मुझे इसी युद्ध भूमि में मार भी डालें,
तो वह मेरे लिये (युद्ध करने की जगह) सर्वथा उचित ही होगा।

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एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥१-४७॥
यह कह कर शोक उद्विग्न हृदय से अर्जुन अपने धनुष बाण छोड कर रथ के पिछले भाग में बैठ गये।

तो इस हिसाब से सबसे शक्तिशाली व्यक्ति जिसको पूर्व में पल प्रति पल अपमानित किया गया हो जिसे बारबार उसके परिजनों समेत आतताइयों द्वारा हत्या कराने का प्रयास किया गया हो, जिसे परिवार समेत गृह निष्काशन दिया गया हो, सब कुछ लूटा गया उसके, तब भी वह व्यक्ति सब चुकाने का अवसर मिलने पर भी सभी को अपना जान कर युद्ध लड़ने से मन कर देता है क्यों की वह अपने परिचितों की हत्या नहीं कर सकता उसका ह्रदय मस्तिष्क तयार नहीं है। सो अर्जुन से बड़ा सहिस्णु व्यक्ति कौन हो सकता है।

लेकिन यही अर्जुन जब योग राज कृष्ण द्वारा सब ज्ञान व् सत्य जानलेते है तब अर्जुन से बड़ा विनाशक और क्रूर हन्ता कोई महाभारत के युद्धा में दीखता ही नहीं है धर्म व् शांति की स्थापना के लिए महा विनाशकारी युद्ध होता है किन्तु धर्म व् शांति की स्थापना सोलह अक्षहुणि सेना के विनाश व् संसार भर के महापराक्रमी योद्धाओं व् उनकी सेना के विध्वंस के बाद ही हो पाती है

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

avdhut के द्वारा
January 9, 2016

वह प्रवीण जी क्या सही व्याख्या किया है आपने वर्तमान और सनातन दोनों के उदाहरणों का सटीक विश्लेषण मैंने भी गीता पढ़ी किन्तु इस पर कभी ध्यान नहीं गयाकिया है आपने सत्य विश्लेषित किया है की जब शांति से जीने वाला व्यकित किसी कारन वश उग्र होता है तो सबसे बड़ा क्रूर बनजाता है

Anil Pandit के द्वारा
January 9, 2016

आप गीता की मनमानी व्याख्या नहीं कर सकते तनिक सावधानी के साथ धर्मग्रंथो पर टिका टिप्पणी करे महोदय

rameshagarwal के द्वारा
January 10, 2016

जय श्री राम प्रवीण जी भगवन कृष्णा जी ने हमें सन्देश दिया की शांति की कोशिश करनी चाइये अन्याय के सामने न झुक कर उनको उचित सबक सिखाना चैये भगवन राम और कृष्णाजी ने कभी किसी आतताई को कभी छोड़ा नहीं क्योंकि वे समाज का और ज्यादा अहित करते भारतीय सहिष्णु है लेकिन आजकल कुर्सी के लिए देश पीछे चला गया

pravin kumar के द्वारा
January 10, 2016

रमेश साहब भगवान कृष्ण के कुरुक्षेत्र में दिए उपदेश बढ़कर क्या ज्ञान हो सकता है वैसे भारत का हर वयक्ति आज कुरुक्षेत्र में अर्जुन वाली स्थिति में है

pravin kumar के द्वारा
January 10, 2016

पंडित जी श्लोकों के हिंदी भावार्थ हमने जस के तस सरल शब्दों में लिखे है

pravin kumar के द्वारा
January 10, 2016

धन्यवाद

Shobha के द्वारा
January 10, 2016

श्री परवीन जी आपके लेख का सार इन सुंदर शब्दों मैं है |मतलब यह की एक पक्षीय सहनशीलता या सहिष्णुता अकर्मण्य व निरीह बना देती है.यही बात हमारे देश के संदर्भ मैं है

pravin kumar के द्वारा
January 10, 2016

जी मैडम जी हम भी कह रहे है भगवन कृष्ण भी कह रहे है और तो और कर्लहोरपर ने भी यही विचार दिया है और किसी भी परिदृश्य में देंखे तो एक तरफा सहनशीलता या सहिष्णुता अकर्मण्य व निरीह बना देती है

Sanjay के द्वारा
January 11, 2016

प्रवीण कुमार जी आप की ये लाइन - अपने समाज के असहनशील तत्वों से, आप अपने सहनशील समाज की रक्षा के लिये आगे नही आते हैं, तब आपका और आपके समुदाय का अंत निश्चित है. का क्या निहितार्थ लगाया जाये. मतलब सभी उग्र किस्म के लोगो को खुली छूट दे दी जाये की बवाल करो .

jlsingh के द्वारा
January 15, 2016

प्रवीण कुमार जी, आपका लेखकीय प्रयास अच्छा है पर महाभारत के बाद पांडवों को क्या मिला वह भी सर्वविदित है. हमें इन ग्रंथों से सीक लेने की जरूरत है न कि महाभारत जैसा युद्ध की और प्रेरित होने की. वैसे महाभारत को पहला विस्व युद्ध माना गया है और अब शायद चौथे विश्व युद्ध की तैयारी चल रही है… होइहैं वही जो राम रची राखा, को करी तर्क बढ़ावहिं शाखा. सादर!

pravin kumar के द्वारा
January 18, 2016

सिंह साहब बहोत ही धन्यवाद मैंने भी आखिरी लाइन में वही व्यक्त किया है की शांति महाविनाश के बाद ही स्थापित हुई की कुरु वंश को आगे बढ़ने के लिए मात्र परीक्षित ही जीवित बचे, किन्तु किसी ने कहा है की युद्ध में भले ही आपको रूचि न हो लेकिन युद्ध को आपमें रूचि रखता है यह भी ध्यान देने योग्य है


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