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इंद्र का सिंहासन चाहिए तो भक्तों को संतुष्ट रखने की कला सीख लें

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नारायण…………… नारायण …………..
कहते जपते जपते महर्षि नारद सातवें (७ वें) मंडल के स्वर्ग में प्रवेश किये
तो नरेंद्र समेत सभी देवगण व् इंद्र सभा के मंत्रीगण अपने सिंहासन और कुर्सियों से उठ कर देवर्षि नारद का अभिवादन किये
सभी देवगण देवराज नरेंद्र के कार्यों अन्य ग्रहों की यात्रा उपलब्धियों के बखान को बंद कर देवर्षि नारद के समाचार को सुनने को उत्सुक हो उठे
और अभिवादन से छूटते ही इंद्र ने सगर्व पूछा की महाराज बताएं आज कल कैसा चल रहा पृथ्वी के देशों में
महर्षि नारद ने कहा की आपके प्रमुख कार्यस्थल जम्बू द्वीप में फ़िलहाल गर्मी बढ़ती जा रही है और सुना है की फोग चल रहा है उसी का असर है कुछ भी स्पष्ट नहीं दिख रहा है
उसी तरह आपकी नीतियां कदाचित समझ में नहीं आरही है किसी को सो आपके भक्त परेशान है
जिसका फायदा आपके विरोधी आपके भक्तों को उकसाने में लगे है जैसे
जय श्री राम से………. भारतमाता की जय
अति हिंदुत्ववाद सनातनवाद से…………. प्रखर राष्ट्रवाद
………….भक्त कन्फूज है और आपके विरोध में धिरे धीरे होने लगे है
आये दिन कोईं न कोई कांड हो जाता है और आपके निर्णयों से भक्त इत्तेफाक नहीं रखते और मत विभाजन हो जाता है भक्त टूट रहे है आपस में ही वाद विवाद कर बैठते है
आपके उपासना में भी बहुत ही कमी आई है आपकी उपासना धिरे धीरे काम हो रही है यज्ञ अनुष्ठान आपके नाम पर पहले जैसे नहीं हो रहे है
इंद्रा सभा में इतना सुनने के के बाद पिंड्रोप साइलेन्स मने चिर शांति छा गयी………………….. वास्तव में बेहद गम्भीर मामला था
देवराज नरेंद्र ने घूर कर आपने मंत्रालय के देवगण को देखा ……………………….सबने मौन सहमति दे दिया ……………की बात तो सत्य है
सो तब दबंग व्यक्तित्व वाले देवराज नरेंद्र चहरे पर बिना कोई भाव प्रगट करते हुए अपने 56 इंच वाले सिने में स्वर्ग की शुद्ध ओरिजिनल ऑक्सीजन भरते हुए इंसानी कंकाल के जैसे हड्डी नुमा ढांचे जिसे वज्र कहा जाता है पर कठोरता से हाथ फेरा………………………
और देवर्षि नारद से बोले महानुभाव आप और आपकी समाचार सूचना तंत्र मिडिया ही इस तरह के प्रपंच और झूठ फैला कर हमारे भक्तों को बरगला रहे है …………..
ठीक है आपका मुंह हम चुटकियों में बंद कर देते किन्तु आप मिडिया महारथी देवर्षि है ………इस तंत्र के चउथे स्तम्भ है आपसे तो बाद में निपटूंगा…………….
फिलहाल भक्तो का इलाज करना होगा इतना सब कुछ मात्र दो साल के अंदर विकास के कार्य करने के बाद अच्छी अच्छी योजनाए लाने के बाद विदेशों में देश की साख बनाने के बाद देश को रक्षा सुरक्षा मजबूत करने बाद, आदि आदि अनेको राष्ट्र हित के कार्य किया
वो भी बिना कोई भ्रष्टाचार में लिप्त हुए ईमानदारी से किये …………..और इन भक्त लोगों को कुछ समझ में नहीं आ रहा है…………..
……………और देवराज ने आदेशात्मक स्वर में देवों को बारी बारी से कार्यक्रम बताया
यम जितेन्द्र देव जो भी इंसान जहाँ कही पे मिले सही गलत कुछ भी हो सबकी जी भर कम्बल कुटाई की जाये …..
अग्नि पियुस देव जगह जगह आग लगनी चाहिए ताकि लोग जलें किन्तु अँधेरा कायम रहे। ………..
बृहस वित्त देव सब व्यक्तियों पर भयंकर किस्म के कर आरोपित कर दो कोई भी बचने न पाए ……….की लोग सिहर उठें
………….मोहन देव कृषको को असीमित परेशान करो ……….
………नितिन भूदेव सड़के बनाओ किन्तु जगह जगह टोल टैक्स लगा दो। ………..
…….धर्मराज सदानंद न्याय का कोई कार्य सही ढंग से न होने पाए लोग न्याय के लिए भटकते रहे। …
……अन्न विलास देव खाद्यान्न के मूल्य बढ़ा दो दालें आदि किसी के थाली में पहुँच से दूर हो जाये ……….
…जाट जल देव पुरे देश में जल की किल्लत हो ताकि पानी के लिए लोग त्राहि त्राहि कर उठे
……अश्विन कुमार जयप्रकश देव लोगों को छोटे बड़े किसी प्रकार रोगों की औषधि सस्ते मूल्य में न मिल पाए
…………….और बाकि के सभी देव अपने अपने कार्यों में लग जाये तुरंत
तभी देव राज नरेंद्र बगल में बैठे उनके गृह विभाग के देव ने पूछा………………….. यह तो आपने बड़ा ही बवाली आदेश दे दिया हंगामा मच जायेगा खैर आपने जो सोचा होगा ठीक ही होगा किन्तु मुझे कोई कार्य नहीं सौंपे,
……….नरेंद्र ने उनको कठोर नजरो से घूर कर देखा और बोले हमने आपको सेकुलर बने रहने को कहा है साथ ही मनमोहनी ढंग से जैसे चुप रहते हुए केवल सब कुछ होते देखते रहने को कहा है मनमोहनी चरित्र स्वयं में उतार ले ………………. याद रखिये मुंह बंद तो बंद
फिर धरती पर भयंकर हाहाकार मच गया लोग त्राहि त्राहि कर उठे कही कोई किसी की भी सुनने वाला नहीं रह गया
देव राज इंद्र सबकी बातों को एक कान से सुनते दूसरे से निकाल देते स्थिति भयंकर होती जा रही थी
तब समस्त जनता के पास एक ही उपाय था की जगत पालनकर्ता श्री भगवत मोहन नाग शैय्या पर विराजित क्षीर सागर में सदैव निद्रा में रहने वाले ईश्वर विष्णु हरी के पास जाया जाये
लोग श्री मोहन विष्णु के पास जा कर धरती के हालात बयान किये तब उन्होंने नरेंद्र को बुलाया और खूब डांट लगाई और कहा की इंद्र का पद अधिकार का नहीं कर्तव्य का होता है अतः केवल आपको ड्यूटी करनी है जनता के विश्वास को ठेस नहीं पहुंचना है
यह धरती जम्बूद्वीप हमारी संपत्ति है यह एक तरह से मेरे स्वामित्व की कंपनी है मैं इसका डायरेक्टर हूँ और आपकी हैसियत केवल एक मैनेजर की या प्रबंधक की जिसके उपलक्ष्य में आपको उचित मानदेय प्राप्त है मनोरंजन के साधन है उचित प्रोटोकॉल है ऐरावत आदि उच्च तककनिकि वाले वाहन दिए गए है सर्वश्रेष्ठ सुरक्षा व्यवस्था दी है और ध्यान रखिए मेरे हाथ में यह शक्ति है की मैं किसी को भी इंद्र के पद पर स्थापित या विस्थापित कर सकता हूँ
अतः जाइये जनता के हित के कार्य करें और सभी को खुश रखने का प्रयास करते रहे.
और हाँ सनद रहे अगली बार भी इंद्र का सिंहासन चाहिए तो कम से कम भक्तों को संतुष्ट रखने की विद्या अथवा कला सीख लें अन्यथा सोचलें क्या क्या अनिष्ट हो सकता है

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

avdhut के द्वारा
April 21, 2016

सुन्दर और हास्य विनोद से भरा हुआ

pravin kumar के द्वारा
April 21, 2016

अवधूत जी धन्यवाद यह एक मराठी लोक कथा से प्रेरित और उसी के आधार लिखा है


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