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वैचारिक मतभेद और व्यवहारिक मतभेद

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वैचारिक मतभेद
सबके विचार एक दूसरे से लगभग नहीं मिलते है सो हो जाता है वैचारिक मतभेद,
ज्योतिष की बात माने तो कभी सूर्य और शनि के चाल के कारण भी हो जाता है वैचारिक मतभेद
फिर यही वैचारिक मतभेद कुछ समय के अंतराल के बाद बढ़ते बढ़ते व्यवहारिक मतभेद में बदल जाता है
जैसे आपके आस पास बहुत से मित्र रिश्तेदार भाई बंधू होंगे जिनका आपने कभी कोई टनटा भी न उखाड़ा हो, कभी किसी का कॉलर या गमछा तक भी न जबरन पकड़ा हो फिर भी वे आप से नाराज रहते है आपसे कन्नी काट लेंगे, बात नहीं करेंगे, मिलना जुलना छोड़ देंगे, उलटे आपकी शिकायतें करते फिरेंगे, क्योंकि आपने उनकी बात नसुनी, उनके बताये तरीके से काम नहीं किया, और होगा यूँ की
आपके यहाँ के किसी कार्यक्रम में शरीक न होंगे क्योँ की नाराज है मने आपसे वैचारिक मतभेद है जो की बढ़ते बढ़ते व्यवहारिक मतभेद में बदल जाता है
आप फलाना ढिमका के समर्थक है वो नहीं है तो वैचारिक मतभेद
आप उनके बताए गए तरीके से कोई काम नहीं करना चाहते है या न किये है तो नाराज हो जायेंगे, मने वैचारिक मतभेद हो जायेगा
आप फलां चीजों को पसंद करते है वो नहीं करते, मने आपसे वैचारिक मतभेद है और अंततः सामाजिक रूप से विरोध शिकायतें करने लगते है
इसी तरह उदाहरण के तौर पे सबसे बड़ा ये की
प्रायः दुनिया भर के सभी खेल संगठन, राजनितिक दल आदि एक अलग निश्चित विचारधारा को ले कर गठित होते है अतः उनके सदस्य नेतागण अनुसरणकर्ता कर्यकर्ता आदि उसी विचारधारा विशेष के समर्थक होते है दुशरे दलों से कोई साम्यता नहीं होती है
इसी अलग अलग विचारधारा के कारण दुनिया के किसी भी राजनितिक दल में प्रायः साम्यता नहीं होती और
चुनावो में, संसदीय कार्यवाहियों में यही दलीय वैचारिक मतभेद व्यवहारिक मतभेद में परिवर्तित हो जाते है और ये नेतागण शिकवे शिकायतों आरोपों की सीमा की हद तक को लाँघ जाते है
किन्तु चुनावो आदि से इतर किसी व्यक्तिगत कार्यक्रम में दुनिया भर के नेतागण आपस में इस तरह मिलते है जैसे इलाहबाद के कुम्भ के बिछड़े हुए भाई बंधू हो
अब भारत में देखे
दिन रात हमेशा पानी पी पी के प्रधानमंत्री पर आरोपों की झड़ी लगा देने वाले और चुनाव प्रचार दौरान, संसदीय कार्यवाहियों के समय या सामान्य समयों भी में राज्यों को तबाह बर्बाद करने का, सांप्रदायिक होने का आरोप लगाने वाले
जैसे कातिल, शैतान, खून का प्यासा, सौदागर मौत का, जैसे थ्रिलर पैकेट बुक्स उपन्यासों के नामकरण वाले आरोप लगाए जाये
और फिर एक दिन अचानक आरोप लगाने वाले सांसद नेताजी के सांसद पोते और पूर्व केंद्रीय मंत्री के बेटी की शादी में प्रधानमंत्री शामिल होते है उनका खूब स्वागत सत्कार होता है ,
सब खानदान समेत एक दूसरे से इसी या किसी कार्यक्रम गलबहियां करते मिले देखे जाते है,
तो ये देखकर वोटर, पब्लिक, कट्टर समर्थक जनता मुर्ख की तरह एक दुशरे का मुंह देख आपस में आश्चर्य युक्त शर्मिंदा होने लगी,
और अगले दिन पार्टी प्रवक्ताओं से जब ये पूछा जाता है की वो आपके धुर विरोधी रहे है फिर उनके कार्यक्रम में कैसे जाना हुआ तो बयान आता है की हम राजनीतिज्ञों में केवल वैचारिक मतभेद है
तो यह समझ में ना आया की ऐसे ही सामान्य जीवन में ये दोस्त मित्र पडोसी कुछ बातों के लिए मतभेद रखते हुए है तो आना जाना बाते करना तक छोड़ देते है किसी व्यक्तिगत कार्यक्रम में शरीक नहीं होते न्योता हकारी तक भी छोड़ देते है
लेकिन ये दोस्त मित्र पडोसी लोग इन्ही नेताओं खिलाडियों के बड़े प्रसंसक या फैन होते है और इन्ही नेताओं की
जो की एक दुशरे के अकंठ विरोधी होते है इनके हर कदम सराहना ही करते है ये प्रसंसक या फैन लोग
लेकिन इन नेताओं के वैचारिक मतभेद के सिध्दांत को ये दोस्त मित्र पडोसी लोग खुद के लिए नहीं मानते है कुछ अलग ही तरह के गुमान या ईगो में रहते हैI
पता नहीं कब ये ऐसे लोग समाजशास्त्र के मानव समूह के नियम को समझेंगेI

“हमसे भी पल दो पल बातें कर लिया करो
ऐ हमनसीं”
“क्या पता आज हम तरस रहे तुमसे गुफ्तगू केलिए’
“कल आप तरस जाओ हमसे मिलने की जुस्तजू लिए”

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
June 23, 2016

जय श्री राम प्रवीण जी आपने बहुत सही फ़रमाया लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद तो होते ही लेकिन गली गरौज नहीं होनी चैये लेकिन हमरे यहाँ जिस भाषा का इस्तेमाल केजरिवाल ,ममता,लालू कांग्रेस के नेता बोलते उससे लोकतंत्र ख़राब हो रहा हम ये सभ्य और नैतिकता पच्छिम देशो से क्यों नहीं सीखते.बहुत दुःख हता जब टीवी में देखते याअखबार में पढ़ते चुनाव आयोग को कुछ करना चाइये सुन्दर भावना के लिए साधुवाद.

avdhut के द्वारा
June 24, 2016

वाह प्रवीण जी आपके तर्कशील आलेख से मन बहुत खुश हो जाता है हमलोगो के आसपास ऐसे लोग होते है नेताओं का आनुकरण करेंगे लेकिन व्यवहारिक जीवन में किसी से मनमुटाव होने पर बहुत नफरत रखते है

pravin kumar के द्वारा
June 27, 2016

रमेश जी नमस्कार धन्यवाद आपने सही व्यक्त किया वैचारिक मतभेद हो लेकिन गली गरौज नहींI


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